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पॉक्सो के गंभीर केस में कानूनी जिरह ने पलटा पूरा मामला- आरोपी बरी झूठे आरोपों के साये में फंसा युवक हुआ बरी, अदालत में पी.एन. सिंह की दलीलों ने बदला केस का रुख गंभीर आरोपों के बावजूद सबूतों के अभाव में आरोपी बरी

DNH / Amit Singh

वलसाड जिले के उमरगाम तालुका के सरीगाम क्षेत्र से जुड़े एक संवेदनशील मामले में वलसाड की अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए आरोपी युवक को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त घोषित कर दिया। मामला पोक्सो अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं से जुड़ा था, इसलिए सुनवाई के दौरान हर तथ्य और हर दस्तावेज को बारीकी से परखा गया। अदालत के सामने प्रश्न केवल आरोपों का नहीं था, बल्कि यह भी था कि क्या प्रस्तुत साक्ष्य उस कठोर कसौटी पर खरे उतरते हैं, जिसे आपराधिक न्याय व्यवस्था “संदेह से परे प्रमाण” कहती है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार वर्ष 2020 में सरीगाम क्षेत्र में रहने वाली एक युवती के साथ आरोपी ने जबरन शारीरिक संबंध बनाए और बाद में वह गर्भवती हो गई। वर्ष 2021 में युवती ने एक बच्ची को जन्म दिया, जिसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एन) तथा 506(2) के साथ पोक्सो अधिनियम की धाराओं के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया। जांच के दौरान डीएनए जांच सहित कई दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए गए और अभियोजन पक्ष ने यह साबित करने का प्रयास किया कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी और आरोपी ने उसका शोषण किया।
मगर अदालत में जब साक्ष्यों की परतें खुलने लगीं, तो कई सवाल भी सामने आने लगे। पीड़िता की उम्र को लेकर प्रस्तुत जन्म प्रमाणपत्र पर संदेह उत्पन्न हुआ। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जन्म प्रमाणपत्र की प्रविष्टि बाद में कराई गई थी और उस दस्तावेज की पुष्टि के लिए संबंधित अधिकारी या रिकॉर्ड तैयार करने वाले व्यक्ति को अदालत में प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसे में अदालत के सामने यह प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या केवल एक दस्तावेज के आधार पर किसी व्यक्ति को गंभीर आपराधिक अपराध का दोषी ठहराया जा सकता है। यहीं से बचाव पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एन. सिंह की दलीलें इस मामले का महत्वपूर्ण मोड़ बन गईं। उन्होंने अदालत के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए यह तर्क रखा कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपों को बिना ठोस और निर्विवाद साक्ष्य के स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि पीड़िता की उम्र ही संदेह के घेरे में है, तो पोक्सो अधिनियम की धाराएं स्वतः लागू नहीं हो सकतीं।
कानूनी बहस के दौरान अदालत में जो तर्क सामने आए, वे इस प्रकार रहे—
📦 अदालत में बचाव पक्ष की मुख्य दलीलें — एडवोकेट पी.एन. सिंह
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए यह बताया गया कि केवल जन्म प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर देने से उसकी प्रविष्टि स्वतः प्रमाणित नहीं मानी जा सकती, जब तक कि उसे तैयार करने वाले अधिकारी या रिकॉर्ड का आधार अदालत के सामने स्पष्ट न किया जाए।
यह भी दलील दी गई कि पीड़िता की वास्तविक उम्र को लेकर संदेह है और अभियोजन पक्ष इसे संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा है। ऐसी स्थिति में पोक्सो अधिनियम की धाराएं स्वतः लागू नहीं हो सकतीं।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क रखा कि मामले में कई गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं और घटनाक्रम को लेकर स्पष्टता का अभाव है।
यह भी कहा गया कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि यदि साक्ष्यों में संदेह हो तो उसका लाभ आरोपी को दिया जाता📦 माननीय न्यायालय के निर्णय के प्रमुख बिंदु
अदालत ने कहा कि पीड़िता की उम्र के संबंध में प्रस्तुत जन्म प्रमाणपत्र की सत्यता संदेह से परे सिद्ध नहीं की गई।
अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि घटना के समय पीड़िता निश्चित रूप से 18 वर्ष से कम आयु की थी।
ऐसी स्थिति में पोक्सो अधिनियम की धाराओं के अंतर्गत अपराध सिद्ध नहीं होता।
आपराधिक मामलों में आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करना आवश्यक है, जो इस मामले में संभव नहीं हो पाया।
इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषमुक्त घोषित कर दिया।
यह फैसला केवल एक मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था की उस मूल भावना की याद भी दिलाता है जिसमें कहा गया है कि “सौ अपराधी छूट जाएं तो भी एक निर्दोष को दंड नहीं मिलना चाहिए।” समाज में कई बार ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जहां व्यक्तिगत, सामाजिक या पारिवारिक कारणों से किसी व्यक्ति को झूठे मामलों में घसीटने की कोशिश की जाती है। ऐसे समय में अदालतें केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि साक्ष्यों और कानून की कसौटी पर निर्णय करती हैं।

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