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डॉ. संजय रमनभाई गामित सरकारी स्कूल की बेंच से सेवा के शिखर तक

Dadra Nagar Haveli

कभी-कभी कुछ लोग अपने काम से नहीं, अपने स्वभाव से इतिहास लिखते हैं।
डॉ. संजय रमनभाई गामित ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन यह साबित करता है कि महान बनने के लिए महंगे स्कूल नहीं, बड़े संस्कार चाहिए।

सरकारी स्कूल से शुरू हुआ सफर
वर्ष 1979 में मधुबन बांध क्षेत्र में जन्मे डॉ. संजय भाई की प्रारंभिक शिक्षा
सिलवासा के सरकारी स्कूलों में हुई।
कक्षा 1 से 7 तक – मधुबन
कक्षा 8 से 10 – रखोली
कक्षा 11 और 12 – सिलवासा
से पढ़ाई पूरी की।
सरकारी स्कूल की उन्हीं साधारण कक्षाओं में बैठकर उन्होंने सीखा कि
हर इंसान बराबर है — चाहे वह अमीर हो या गरीब।
MBBS से MD तक की मेहनत
वर्ष 1996 से 2003 के बीच डॉ. संजय भाई ने कड़ी मेहनत और लगन से
MBBS की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में और गहराई से सेवा करने का निर्णय लिया
और वर्ष 2006 में एम.डी. (स्किन एवं वीडी) की डिग्री हासिल की।
यह सफर आसान नहीं था, लेकिन सरकारी स्कूल से मिले आत्मविश्वास और
संघर्ष करने की आदत ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया।
सेवा का लंबा अनुभव
एमडी बनने के बाद
वर्ष 2006 से मार्च 2019 तक
उन्होंने VBCH में लगातार चिकित्सा सेवाएं दीं।
इस दौरान उन्होंने हजारों मरीजों का इलाज किया,
खासतौर पर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में
त्वचा रोगों को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर किया।
वर्ष 2019 से आज तक
डॉ. संजय भाई का अस्पताल केवल इलाज की जगह नहीं,
बल्कि भरोसे और सुकून का घर है। डॉ. संजय भाई ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सिलवासा के सरकारी स्कूलों से प्राप्त की। वही साधारण स्कूल, वही सीमित संसाधन और वही आम बच्चों जैसी दिनचर्या। लेकिन इन सरकारी स्कूलों की बेंचों पर बैठकर उन्होंने जो सबसे बड़ी सीख पाई, वह थी — सबको बराबर समझने की सोच।
आज जब वे एक जाने-माने और अनुभवी चिकित्सक हैं, तब भी उनके भीतर वही सरकारी स्कूलों से मिली सादगी, ईमानदारी और इंसानियत आज भी जीवित है।
अस्पताल नहीं, भरोसे का घर
डॉ. संजय भाई का अस्पताल केवल इलाज की जगह नहीं है, बल्कि यह भरोसे, अपनापन और सुकून का केंद्र है।
उनके लिए मरीज की पहचान उसकी दौलत, पद या पहचान से नहीं होती।
अस्पताल में आने वाला हर व्यक्ति —
चाहे वह गरीब मजदूर हो,
कोई बुजुर्ग हो,
एक सामान्य नागरिक हो,
या फिर करोड़पति

डॉ. संजय भाई की नजर में सब एक समान हैं।
वे मरीज को उसकी हैसियत से नहीं, उसके दर्द से पहचानते हैं।
₹200 फीस, लेकिन सेवा अनमोल
आज के दौर में जहाँ इलाज एक महंगा व्यवसाय बनता जा रहा है, वहीं डॉ. संजय रमनभाई गामित मात्र ₹200 की नाममात्र फीस लेकर मरीजों का उपचार करते हैं।
यह फीस उनके लिए कमाई का साधन नहीं, बल्कि केवल एक औपचारिकता है।
उनका साफ़ मानना है —
“डॉक्टर का असली धर्म पैसा कमाना नहीं, बल्कि पीड़ा को कम करना है।”
इसी सोच के कारण उनका नाम सिर्फ एक डॉक्टर के रूप में नहीं, बल्कि एक सच्चे सेवक के रूप में लिया जाता है।
सरकारी स्कूल से निकले संस्कार
डॉ. संजय भाई आज भी गर्व से कहते हैं कि वे सरकारी स्कूल के छात्र रहे हैं।
वहीं से उन्होंने सीखा कि
सादगी में ताकत होती है,
सम्मान व्यवहार से मिलता है,
और सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
सरकारी स्कूलों से निकलकर आज जिस ऊँचाई पर वे खड़े हैं, वहाँ पहुँचकर भी उन्होंने अपनी जड़ों को कभी नहीं भुलाया। यही वजह है कि उनकी सफलता कभी घमंड नहीं बनी, बल्कि समाज के लिए एक जिम्मेदारी बन गई।
एक डॉक्टर, जिसे समाज अपना मानता है
डॉ. संजय रमनभाई गामित केवल इलाज नहीं करते, वे आश्वासन देते हैं,
वे केवल दवाइयाँ नहीं देते, वे हिम्मत भी देते हैं।
उनका सरल व्यवहार, शांत स्वभाव और हर मरीज के लिए समान दृष्टिकोण उन्हें एक अलग पहचान देता है।
आज वे उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा हैं, जो सरकारी स्कूलों से पढ़कर बड़े सपने देखते हैं।
डॉ. संजय भाई का जीवन यह सिखाता है कि जब शिक्षा के साथ संस्कार जुड़ जाएँ, तब समाज को डॉक्टर नहीं, देवतुल्य सेवक मिलते हैं।

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